Ashok Sharma
कुछ अपनी बात Something MineArchive for April, 2007
बहते पानी में बुलबुलों सी (कविता)
बहते पानी में बुलबुलों सी
आती औं मिट जाती-
याद बार-बार तुम्हारी ।
तन-मन के सुखों में दबी
रह जाती मैं थकी हारी ।
बहती हवा को जैसे-
बांध न पाया कोई,
रथ को प्रिय तुम्हारे,
देखती मैं ललचाई,
प्रकाश में सूरज के
नित ऊगते औं ढलते,
वेग तुम्हारा जो पा जाती
प्रिय दौड़ती-
मैं भी छाया सी
पीछे-पीछे तुम्हारे
न रहते अपरिचित,
पथ कोई भी
लोक में आनंद के -
विचरती मैं हे अनंत
तुम्हारे ही संग-संग ।
- ये कौन सी छाया है , मर्म तक पहुंचने की चाह है (तत्पश्चात सर्जक परिचय) (हिन्दी छायावाद छायावादी कविता समर्पित कवि)
सुगंध जिनकी समा गई सांसों में (कविता)
जो बस गए आंखों में
सोई मेरी पलकों में
याद आते हैं अधर
रस जिनका मधुर
धुल गया मेरे प्राणों में ।
बाकी यहां Rest Here (हिन्दी छायावाद समर्पित कवि छायावादी कविता)